23 मई, 2013

करीब से मैं की सुनो तो ...

तुम मानो न मानो
हम इसे स्वीकार करे न करे 
पर मैं मैं ही हूँ 
... यह मैं मेरा अहम् नहीं 
मेरी पहचान है 
मैं हट जाऊँ 
दे दूँ अपनी आहुति 
तो रह क्या जाएगा !
अस्तित्वहीन एक शरीर ................

                        मैं - रश्मि प्रभा 




कई बार हास्य महज हंसने के लिए नहीं होता .सहज सन्देश भी छिपा होता है ...
अपने मैं को संतुष्ट करने के लिए हम क्या नहीं कहते , क्या नहीं करते ...जब अपने मुख से या किसी और के मुख से लगातार मैं -मैं सुनायी देता है तो एक उकताहट सी हो जाती है ....
हम जो होते हैं उसे इतने विस्तार से क्या बयान करना है , वह नजर आ ही जाता है , दूर रहने वालों को कुछ देर मुखौटों से बहलाया जा सकता है , मगर करीब आकर साफ़ चेहरा नजर आ जाता है इस "मैं" का ...

             




मत पूछ मैं क्या हूँ
मैं ये हूँ , मैं वो हूँ ....

मैंने ये किया , मैंने वो किया
मैंने उसको रुलाया
मैंने उसको सताया
मुझसे वो यूँ प्रभावित हुआ

 मैंने उसको यूँ हंसाया
मैं ये कर सकूँ मैं वो कर सकूँ
मैं क्या- क्या नहीं कर सकूँ
मैं... मैं ...मैं... मैं...

मन करता है कभी -कभी
इक मोटी जेवड़ी बाँध दूं
इस मैं के गले में
और रेवड़ के साथ खिना दूं
गड़ेरिये की लाठी की हांक पर
फिर मजे से करते रहियो
मैं ... मैं ...मैं ....मैं ...

---हास्य कविता

जेवड़ी -- रस्सी
खिना दूं --भेज दूं













नाम- वाणी शर्मा 
ब्लॉग - गीत मेरे  एवं ज्ञानवाणी   .

8 टिप्‍पणियां:

  1. मैंने उसको यूँ हंसाया
    मैं ये कर सकूँ मैं वो कर सकूँ
    मैं क्या- क्या नहीं कर सकूँ
    मैं... मैं ...मैं... मैं...
    इस मैं का बखान बखूबी करती ये पंक्तियाँ .... बहुत खूब

    आभार इस प्रस्‍तुति के लिए
    सादर

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  2. मन करता है कभी -कभी
    इक मोटी जेवड़ी बाँध दूं
    इस मैं के गले में
    और रेवड़ के साथ खिना दूं
    गड़ेरिये की लाठी की हांक पर
    फिर मजे से करते रहियो
    मैं ... मैं ...मैं ....मैं ...………………हा हा हा ………हास्य में भी सुन्दर व सार्थक संदेश छुपा है सारगर्भित रचना

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  3. मैं बस अहम् न बन जाए ...
    अन्यथा ये बरबाद कर देता है ...

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  4. बहुत ही सुन्दर संदेश देती बेहतरीन रचना.

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